बातो के रफूगर :भारतीय मीडिया

बातो के रफूगर :भारतीय मीडिया

मैंने एक बड़ी रोचक कहानी पढ़ी.जिसका आज के मीडिया और राजनीतिक वर्ग के मौजूदा परिदृश्य से बिलकुल उचित सम्बन्ध निकल कर आता है.

इस कहानी में एक राजा अपने राज्य में मुनादी करवा देता है कि राज्य में जो भी व्यक्ति अपनी विशेष योग्यता से राजा को प्रभावित कर देगा उसे अच्छा इनाम दिया जाएगा.

राज्य के विभिन्न हिस्सों से अनेक लोग आये.सभी ने अपनी विशेष योग्यता का प्रदर्शन किया.किसी ने बेहतरीन तलवारबाज़ी दिखाई तो किसी ने अपने शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन किया.किसी ने राजा के लिए लिखी अपनी कविता पढ़ी तो किसी ने वेद की अपनी समझ का प्रदर्शन किया.

राजा अपने राज्य के प्रतिभाशाली लोगो से मिल कर बहुत प्रसन्न हुवे.सभी को उचित पुरस्कार से सम्मानित किया गया.सबसे अंत में एक व्यक्ति ऐसा आया जिसकी प्रतिभा सबसे अलग थी.राजा ने उससे उसकी प्रतिभा के विषय में पूछा.तब उसने उत्तर दिया कि राजा साहब मैं “बातो की रफ्फू” करता हूँ.

तब राजा बड़े आश्चर्यचकित हुवे और उसे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने को कहा.वह व्यक्ति बोला की समय आने पर मैं अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करूँगा.और राज साहब से अनुरोध किया की उसे राजा साहब अपनी सेवा में रख ले.राजा ने उस व्यक्ति का अनुरोध स्वीकार कर लिया.

अब एक दिन राजा अपने मित्रो के साथ बैठे हुवे थे.सभी अपनी अपनी शेखी बघार रहे थे.तभी राजा बोले की मैंने शिकार पर एक तीर से ही शेर का पैर और कान बेध दिया था.अब सभी आश्चर्य में पड़े और कहने लगे की यह संभव नहीं है.तब राजा ने रफूगर की तरफ देखा.

रफूगर बोला राजा साहब बिलकुल सही कह रहे है.राजा साहब ने जब तीर मारा तभी शेर के कान में खुजली गई और शेर ने अपने तीर लगे पैर से ही कान को खुजला दिया जिससे पैर में लगे तीर से शेर का कान भी बीध गया.सब आश्चर्य से एक दूसरे की तरफ देखने लगे और राजा उस रफूगर से अत्यंत प्रसन्न हुवे.

इस कहानी की तरह आज भी राजा और उनके रफूगर हमारी व्यवस्था में है.आज के राजा विभिन्न राजनीतिक दल और रफूगर मीडिया वाले है.यह रफूगर इतने समर्थ और योग्य है कि इनके आगे पार्टी के प्रवक्ता भी फीके है.

सभी राजनीतिक दलों ने अपने रफूगर रखे हुवे है.भाजपा के अलग कांग्रेस के अलग वामपंथियों के अलग रफूगर है.अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी का जन्म ही इन रफ़ूगरो ने किया है.यह अपने काम में इतने माहिर है कि इनका राजा कुछ भी बोले यह उसे सही साबित कर देते है.

सभी अपने को निष्पक्ष और स्वतंत्र बताते है.लेकिन कभी भी अपने राजा के खिलाफ गलती से भी एक शब्द नहीं निकालते.और आपस में ही एक दूसरे को किसी राजनेता की गोदी में साबित करने का प्रयास करते रहते है.

सरकारी रफूगर सरकार के हर कदम का लाभ बताते है और अगर सरकार से गलती भी हो जाये तो यह उसे सही साबित करते रहते है.वैसे ही विपक्ष के रफूगर अपने नेतावो के झूठे आकड़ो और गलतबयानी को सही साबित करने में लगे रहते है.

विपक्षी “बातो के रफूगर” ज्यादा योग्य साबित होते है क्योकि वो कई दशकों से इसी काम में लगे हुवे है.उन्हें रफ़ूगीरी का ज्यादा अनुभव है.अभी का सरकारी मीडिया अभी रफ़ूगीरी के पैतरे सीख रहा है.

नए नोटों में चिप की बात हो या आलू से सोना बनाने की बात हो या लालू यादव का जेल जाना हो.अथवा दिल्ली में VIP कल्चर ख़त्म करने से बच्चो की कसम वाली बात हो.बातो के रफूगर अपने राजा के लिए तुरंत सक्रिय नजर आये और अपने तर्कों से उसे सही साबित किया.रफ़ूगरो ने पूरी सफलता से जनता को मुर्ख बनाया.

पहले लुटियन जोन के माने जाने वाले पत्तलकारो (रफ़ूगरो) की बड़ी इज्जत थी जनता में.यह इस हद तक प्रभावी हो गए थे की इनकी बात पत्थर की लकीर होती थी.यह सरकार में किसी को महत्वपूर्ण पद तक दिलवा रहे थे.यह सरकार बनाने और गिराने की हद तक प्रभावी हो गए थे.

यह अपने राजा की खामिया छुपाने में अत्यंत माहिर थे ही और इसका इन्हे भरपूर लाभ भी मिला.परन्तु जैसे ही हर हाथ में मोबाइल आया और सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ा.इनके झूठ की दीवार गिर गयी. इनकी सारी रफ़ूगीरी का हुनर जनता समझ गयी है.अब जनता पहचानने लगी है की कौन किस पार्टी का रफूगर है.

इसलिए अब जनता इन पर विश्वास नहीं करती है.जनता के इस धारणा पर एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वे ने भी मोहर लगाई है.हमारे देश की मीडिया ने विश्वसनीयता की इस लिस्ट में नीचे से टॉप किया है.

हद की बात यह की ये सभी अभी भी सुधारने को तैयार नहीं है और अभी भी बड़ी बेशर्मी के साथ अपने राजा का बचाव करने में सक्रिय है.जबकि लोकतंत्र में राजा जनता है और इन्हे जनता के मुद्दों से ज्यादा वास्ता नहीं है.इन्हे लोकतंत्र का चौथा खंबा भी कहा जाता है.लेकिन “शर्म तो इन्हे आती ही नहीं”

 

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जय हिन्द

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